Memorable

इंदिरा गाँधी का यादगार भाषण (१९८३)

मेरे सम्माननीय साथियों,

तृतीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है। मेरा जन्म ऐसी नगरी में हुआ है, जो भारतीय संस्कृति की केन्द्र है और ऐसे समय जब राष्ट्रीयता की हवा जोरों से उठी थी। तब काम अधिकतर उर्दू में होता था और पढ़े-लिखे लोग अक्सर फारसी के आलिम होते थे। उसका असर मेरे दादा और परिवार पर भी था। लेकिन साथ ही उन्होंने हिन्दी के महत्व को उस समय समझा और मोतीलालजी ने अहिन्दी भाषियों के लिए हिन्दी पढ़ाने की पाठशाला का शिलान्यास नासिक में बहुत वर्षों पहले किया था। मेरे पिता जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के पहले भी हिन्दी के लिए बहुत काम किया और देश के स्वतंत्र होने पर हिन्दी के विकास के लिए विद्वानों के परामर्श से अनेक योजनाएं चलाई, जिससे हिन्दी में विश्वकोश, शब्दसागर तथा सैकड़ों ज्ञान-विज्ञान के ग्रन्थ लिखे जा सके।

विश्व हिन्दी सम्मेलन का अपना विशेष महत्व है। यह किसी सामाजिक या राजनीतिक प्रश्न अथवा संकट को लेकर नहीं, बल्कि हिन्दी भाषा तथा साहित्य की प्रगति और प्रसार से उत्पन्न प्रश्नों पर विचार के लिए आयोजित किया गया है।

मुझे खेद है कि इतने वर्ष बीच में बीत गए जब हम मिल नहीं सके। आप सब हिन्दी के प्रेमी और विद्वान् हैं। अपने सामने मुझे बड़े-बड़े कवि, लेखक और दूसरे ऐसे लोग दिखाई पड़ रहे हैं। आप में से बहुत से ऐसे भी होंगे जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है। भारत से ही नहीं, संसार के सभी अंचलों से हिन्दी प्रेमी यहां एकत्रित हुए हैं और आप देख रहे हैं कि यह हाल कैसे भरा हुआ है। मैं आप सबका हार्दिक स्वागत करती हूं। हिन्दी हमारी राजभाषा और विश्व-भाषा है। सबके मन में लालसा है कि हिन्दी एक महान भाषा बने।

विदेशों में हिन्दी अधिकतर हमारे मजदूर भाइयों-बहनों के साथ गई। उनकी यह सांस्कृतिक धरोहर रही और अपने सत्व से वहां कायम रही। हिन्दी का जन्म संस्कृत और जनता की आम भाषा के मिलने से हुआ। इस भाषा को अहिन्दी भाषा-भाषियों ने संवारा और बढ़ाया। केशवचंद्र सेन, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी जैसे अहिन्दी भाषा-भाषी महान पुरुषों ने इसका प्रचार किया और इसे बल दिया। विदेशी विद्वानों ने भी इसकी सेवा की और ग्रियर्सन जैसे व्यक्तियों ने हिन्दी में ज्ञान का खजाना बढ़ाया। महात्मा गांधी ने कहा है कि यदि भारत को एक राष्ट्र बनना है तो चाहे कोई माने या न माने, राष्ट्र भाषा तो हिन्दी ही बन सकती है। तमिल के महाकवि सुब्रह्मण्य भारती ने भी राष्ट्र की एकता के लिए राष्ट्रभाषा हिन्दी पर जोर दिया।

हमारे स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दी, उर्दू तथा भारत की दूसरी भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। देश के निर्माण के लिए इस भूमिका को और बढ़ाना है। विदेशों के लिए इसे प्रेम और सद्भाव की वाहिका बनानी है। हमारे कवियों और साहित्यकारों ने जेलों में भारतीय भाषाओं और हिन्दी-उर्दू के गीत गा और सुन कर प्रेरणा ली और दी तथा कभी न बुझनेवाले स्वतंत्रता के दीप में स्नेह-दान किया।

भारत में अनेक भाषाएं हैं। हिन्दी के प्रेमी यह जानते हैं कि ये सब आपस में बहनें हैं। जितना ही इनमें स्नेह और समझ बढ़ेगी उतना ही हिन्दी को बल मिलेगा और दूसरी भाषाओं को भी।

गांधीजी ने कहा था कि ‘हिन्दी के जरिए प्रांतीय भाषाओं को दबाना नहीं चाहता ताकि एक प्रांत दूसरे से सजीव संबंध जोड़ सके।’ गांधीजी ने हिन्दी का उपयोग स्वाधीनता संघर्ष की वाणी के रूप में किया।। परिणाम यह हुआ कि हिन्दी भाषा में एक नई जान पड़ी, एक नया तेवर और स्वर पैदा हुआ।

हिन्दी को सभी भारतीय भाषाओं के बीच संपर्क का काम करना है। हिन्दी इसलिए मान्य नहीं हुई कि वह सबसे संपन्न भाषा है बल्कि इसलिए कि अहिन्दी भाषाभाषियों ने इसे अपनाया। उस पर उनका भी स्वत्व और अधिकार है। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा कि भारतीय भाषाएं नदियां हैं, हिन्दी महानदी। हिन्दी में यदि और नदियों का पानी आना बन्द हो जाए तो हिन्दी स्वयं सूख जाएगी और ये नदियां भी भरी-पूरी नहीं रह सकेंगी।

आधुनिक युग विज्ञान और तकनीकी का है। मानव की प्रगति के लिए इसकी बहुत आवश्यकता है। ज्ञान दिन-प्रति-दिन तीव्र गति से बढ़ रहा है। हिन्दी में विज्ञान और तकनीकी के साहित्य को बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ाना चाहिए। विश्व की अन्य संपन्न भाषाओं से जितना ज्यादा ज्ञान आएगा उतनी ही जल्दी हिन्दीवाले उसकी जानकारी से लाभ उठा उन्नति कर सकेंगे। इसी कारण आवश्यक है कि हमारे बड़े-बड़े वैज्ञानिक हिन्दी के माध्यम से सोचना और सीखना शुरू करें। मुझे खुशी है कि अब बच्चों के जो कार्यक्रम हैं उनमें इसका अधिक उपयोग हो रहा है। हिन्दी तब बढ़ेगी जब उसमें विज्ञान और ज्ञान का ऐसा साहित्य रचा जाए जिसे विश्व की अन्य भाषाएं ग्रहण करने के लिए लालायित रहें। हिन्दी को गुणों से भरना है और ऐसे विचारों से भरना है कि यह जनता के हित में अधिक से अधिक ज्ञान दे सके।

शब्द को भारत में ब्रह्म कहते हैं। ऐसे ही हिन्दी को व्यापक होना चाहिए। शब्दों का तो बहुत बड़ा खजाना है, किन्तु यह खजाना उपयोगी तभी होगा जब शब्दकोशों में बंद न रहे और उसका प्रयोग हो, हमारे प्रतिदिन के जीवन में। अब हिन्दी में लाखों नए शब्द हैं। इससे हिन्दी का विस्तार स्पष्ट है। हिन्दी का प्रचार-प्रसार तभी संभव है जब इसे सभी लोगों का विश्वास प्राप्त हो और साथ ही हिन्दीभाषी दूसरी भाषाओं को मान दें।

भाषा आदान-प्रदान का माध्यम है। राजनीतिक भेदभाव लाने से उसका महत्व घटता है। इसी प्रकार धर्म के नाम को राजनीति में लाना धर्म को संकीर्ण करता है।

हिन्दी में नवीन विचार, ज्ञान एवं मनुष्य के दु:ख-दर्द का साहित्य बढ़ाना चाहिए ताकि लोगों को उससे संतुष्टि हो और अपनापन दिखे। हमारे देश में त्रिभाषा सूत्र है। मातृभाषा तो आवश्यक है ही, राष्ट्रभाषा अन्य भाषाओं के बीच की कड़ी है और एक बाहरी भाषा अंतरराष्ट्रीय कड़ी के रूप में चाहिए। इससे राष्ट्र की एकता को बल मिलेगा,  अंतर्राष्ट्रीय मैत्री बढ़ेगी और संसार से ज्ञान लेने और देने के लिए दरवाजे खुले रहेंगे।

भारत सरकार ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए यथाशक्ति प्रयास किए और कर रही है। हजारों पुस्तकें सरकारी सहायता से लिखी गई और छपीं। पांच-छह लाख पृष्ठों का अनुवाद हुआ। भारत सरकार ने सभी राज्य सरकारों को एक-एक करोड़ रुपये अपनी-अपनी भाषाओं में ज्ञान और विज्ञान के उच्च साहित्य प्रकाशन के लिए दिए जिनसे कई हजार अच्छी किताबें छपीं। सरकार ने वैज्ञानिकों और तकनीशियनों के सहयोग से पांच लाख पारिभाषिक शब्दों का निर्माण कराया, जिनका पुस्तकों में प्रयोग हो रहा है। अहिन्दी भाषा-भाषियों को हिन्दी सीखने के लिए पूरे अवसर दिए जाते हैं। संसार की बहुत-सी भाषाओं और हिन्दी के शब्दकोश विद्वानों द्वारा बनाए जा रहे हैं। इन सब प्रयत्नों से हिन्दी ने प्रगति की है, यद्यपि हमें अभी बहुत कुछ करना है।

भाषा को अपने विकास के लिए केवल सरकार पर निर्भर नहीं रहना है। सभी समर्थ लोगों एवं संस्थाओं को भारत तथा विदेश में प्रचार के लिए सद्भावनापूर्वक प्रयास करते रहना चाहिए। इस समय जैसे कि हमारे शिक्षामंत्री ने कहा है कि संसार के अनेक देशों में और बहुत से विश्वविद्यालयों और संस्थानों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है और हिन्दी पर शोध हो रहा है। अब विश्व में हिन्दी और भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि बढ़ी है। कल ही मैं एक सभा में जा रही हूं जिन्हें ‘रोमा लोग कहते हैं’ वे लोग समझते हैं कि बहुत वर्ष पहले, सदियों पहले वे भारत से ही निकले और दुनिया के हर भाग में फैले। आज भी उनकी भाषा में बहुत से शब्द हिन्दी, पंजाबी और कुछ दूसरी भारतीय भाषाओं के हैं। लोग भारत और उसके बारे में अधिक जानना चाहते हैं। हिन्दी के पठन-पाठन की कुछ व्यवस्था विदेशों में पहले से ही थी। सैंकड़ों वर्षों से थोड़े से विदेशी साहित्यकार हिन्दी के साहित्य को रच रहे हैं। उन्होंने हिन्दी की पुस्तकों का अनुवाद भी अपने देशों में किया है।

अब चर्चा है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी भी मानी जाए। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी के लिए यह वास्तव में बड़ी बात होगी, किन्तु उससे बड़ी बात यह होगी कि भारत में मौलिक साहित्य इतना आगे बढ़े कि शोध तथा अन्वेषण का वह माध्यम बने और हिन्दी का साहित्य इतनी उच्च-कोटि का हो कि संसार के लोगों को हिन्दी न जानने से अभाव लगे।

भाषा की टेक्नालाजी तेजी से बढ़ रही है। अनुवाद के लिए कप्यूटर आदि का प्रयोग हो रहा है। हिन्दी के वैज्ञानिकों और तकनीशियनों को इस दिशा में समय के साथ ही नहीं, दूर का सोचना चाहिए जिससे हिन्दी और हमारी दूसरी भाषाएं पिछड़ न जाएं।

हिन्दी में पत्रिकाएं और उनके पढ़ने वालों की संख्या बढ़ी है। सिनेमा और फिल्म-संगीत ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार में बड़ी सहायता की है। जो पत्र-पत्रिकाएं और फिल्में जनता तक पहुंचती हैं, उन्हें रचनात्मक और गुणात्मक होना चाहिए ताकि भारत जैसे महान देश की सांस्कृतिक चेतना वे प्रकट कर सकें।

हमारी सरकार ने एक हिन्दी विश्व-विद्यालय की स्थापना पर विचार करने के लिए कुछ समय पहले ही कमेटी नियुक्त की थी और मेरी आशा है कि उसका काम तेजी से आगे बढ़ा है।

हिन्दी सारे विश्व में मैत्री और सद्भाव की ध्वजा फहराए। हमारे अमूल्य संदेश-सह-अस्तित्व, शांति और अहिंसा को दुनिया के दूर से दूर स्थान में फैलाए। यह हम सबकी कामना होनी चाहिए। यही इसकी सार्थकता होगी।

काका साहब कालेलकर कहा करते थे कि ‘अहिंसात्मक लड़ाई लड़नेवाली यह भाषा सारे संसार को आजादी का संदेश दे सकती है और दमन के खिलाफ आवाज उठा सकती है।’ मैं यह कहूंगी कि विश्व-शांति और दलित मानव के उत्थान में इसकी भूमिका प्रेरणात्मक होनी चाहिए तभी सब मानव जाति की सेवा यह भाषा कर सकेगी।

मैं आशा करती हूं कि इस सम्मेलन से हिन्दी का अधिक प्रचार होगा और सही मायने में विश्वभाषा हिन्दी बन सकेगी। आप सबका मैं फिर से स्वागत करती हूं और इस शुभ अवसर पर अपनी शुभकामनाएं देती हूं। धन्यवाद!

(तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन में दिया गया भाषण)।

 

महादेवी वर्मा का भावपूर्ण उव्दोधन (१९८३)

समापन समारोह है, तो मन भारी है

आज समापन-समारोह है। यानि आज जा रहे हैं तो मन भारी है। विदा अच्छी लगती नहीं है, लेकिन क्या करूं विदा में ही मुझे बोलना है। मैं प्रयाग की पुण्यभूमि से आई हूं, जहां यमुना, गंगा में विलीन हो जाती है। अंत:शरीरा सरस्वती अपना परिचय नहीं देती और रहती है साथ, क्योंकि यह तो साक्षात् मिलनभूमि है और आज भी एक प्रकार का पर्वस्थान है। तीर्थ है जिसमें हम सब मिले हैं।

देखिए, देश तो भिन्न हो सकते हैं जैसे फूल रंगों से भिन्न होते हैं। आकृति में भिन्न होते हैं। परन्तु उनके सौरभ को मिलने से कोई रोक नहीं सकता। वह एक होता है। इसी तरह हमारा स्नेह, हमारा सौहार्द्र, हमारी बंधुता एक है और इसी कारण विदेश से इतने बंधु आ गए हैं हमारे प्रेम के कारण, हिन्दी प्रेम के कारण। उन सबका मैं अभिनंदन करती हूं। उन सबको अपनी वंदना देती हूं।

भारत बड़ा राष्ट्र है और उसके एक-एक भूखंड में एक-एक देश है, लेकिन बड़े राष्ट्र को जोड़ने के लिए, एक रखने के लिए, संवाद के लिए हमको एक भाषा चाहिए। बिना इसके नहीं चलेगा। और वह भाषा हिन्दी हो सकती है। हिन्दी सच्चे अर्थ में भूमिजा है, वाटर वर्क्स नहीं है। वह दूब है जिसको लेकर हम संकल्प करते हैं। वास्तव में हिन्दी की विशेषता देखकर ही उसे देश की राजभाषा का पद दिया गया था। अब संयोग ऐसा हुआ है कि वह बेचारी वहीं है और अंग्रेजी प्रेत की तरह हमारे सिर पर सवार है। और हमारा शासन और विचित्र है। वह कहता है भाषा को पहले समर्थ बनाओ। इससे अद्भुत कुछ बात नहीं है। प्रयोग में बिना लाए कोई भाषा समर्थ कैसे होती है। भाषा का समर्थन रूप प्रयोग में आने पर ही होता है। हमने क्या किया है कि घोड़े को गाड़ी के पीछे बांध दिया है और कहते हैं गाड़ी चलेगी। वह कभी नहीं चलेगी। न सौ वर्ष, न दो सौ वर्ष। कभी नहीं चलेगी। अब सब कहते हैं, अरे आपके पास तो साहित्य नहीं है। विज्ञान का ज्ञान जब हो जाएगा तब देखा जाएगा। मैं आपको इतना बताती हूं कि हर विभाग के लिए इतनी पुस्तकें, इतनी सहायिकाएं छप चुकी है कि कोई भी अगर थोड़ा कष्ट उठाकर उनका प्रयोग करना चाहे तो कर सकता है। लेकिन हमारी पुस्तकों को कोई देखता नहीं है।

देखिए, बैंकिंग का सारा काम, पारिभाषिक शब्दावली हमारे पास है। न्याय कहता है सब कुछ हमारे पास है। डाकखाने का समय और कार्य सब है, लेकिन कौन देखे, उसको कोई देखता नहीं है। जाएं तो देखिए कि वहां सब साहित्य है, विधि का सारा साहित्य है, लेकिन टंकण नहीं है। टाइपराइटर नहीं है।

अच्छा और देखेंगे। अंग्रेजी में निर्णय लिया जाता है। हिन्दी में लिख सकता है, लेकिन नहीं लिखता है। बेचारा जो न्यायालय में जाता है, वह वकील से हाथ जोड़ता हुआ घूमता है, क्या हुआ, वकील साहब हारे या जीते। कौन क्या बोला- वह नहीं जानता और किसी कार्यालय में दो-चार जो हिन्दी में काम करते हैं, वह पूरी वर्णव्यवस्था में मानों शूद्र हैं। सब उनको हीन मानते हैं, छोटा मानते हैं। जितनी प्रतियोगिताओं की परीक्षाएं होती हैं, प्रश्नपत्र अंग्रेजी में आते हैं। आप हिन्दी में काम कीजिए, परीक्षा अंग्रेजी में दीजिए।

तो वास्तव में अंग्रेजी के प्रेत से हमें मुक्ति कैसे मिले। आपके संकल्प से हो सकती है। जो आपको मैं इतना ही कहती हूं कि आप यह न सोचिए कि भाषा समर्थ नहीं है। समर्थ है वह। उसके ज्ञान, विज्ञान और जितनी विधियां है, आप देखा कीजिए- हरेक तहखाने में भरे हुए हैं, तल भरे हुए हैं। कोई देखता नहीं क्या होता है उनका। और आप सोचिए कि एक विधि पर वह पुस्तक लिखता है। बेचारा मर-मरके लिखता है, भूखा मरके लिखता है और वह आपके कटघरे में बंद है, बाहर आती नहीं है। तो एक बात यह भी मान लीजिए। हमको लेखा-जोखा बताइए कितनी पुस्तकें कितने पारिभाषिक शब्द छप चुके हैं। एक बार आप लेखा-जोखा ले लीजिए। मेरे पास तो बहुत हैं। क्योंकि जो लिखता है, रोता-धोता मेरे पास भेज देता है। मैं कुछ नहीं कर सकती हूं। लेकिन आपस में कहती हूं कि इसको समारोह मत मानिए। मेले में आदमी खो जाता है। एक दिन बहुत अच्छा समारोह करते हैं। आप इतने लोग बैठे हैं, अगर आप संकल्प लें तो कल क्या नहीं हो सकता। लेकिन हम नहीं करते हैं।

तो वास्तव में आज आपके संकल्प का दिन है। मैं यह नहीं मानती कि जब सब विदा हो जाएंगे तो आप कुछ काम करेंगे। करेंगे नहीं कल से खो जाएंगे। और हो सकता है, सात वर्षों में फिर मिलें। यह सात वर्ष का जो अंतर है, वह बहुत भयंकर है। जब हिन्दी को पंद्रह वर्ष के लिए रोका था कि पंद्रह वर्षों के बाद यह भाषा राजभाषा हो जाएगी, तो मैंने टंडनजी से कहा था कि पंद्रह वर्ष तक इसको आप फांसी पर लटकाएंगे और जब उतारेंगे तो कहेंगे आधी मर गई। तो आज ही कीजिए। छोटे-छोटे देशों में देखिए, उन्होंने अपनी भाषा को दूसरे दिन राष्ट्रभाषा बना दिया है।

हम हिन्दी प्रदेशों में भी राजभाषा नहीं बना पाए हैं। और तमाशा है कि उन्होंने हमें उर्दू से उलझा दिया है जिसका कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि हिन्दी- उर्दू दोनों एक भाषा है, वाक्य-विन्यास एक है। व्याकरण एक है, सर्वनाम एक हैं, ग्रंथ एक हैं, एक ही भाषा है। हम संस्कृत लाते हैं, वे फारसी के शब्द लाते हैं। इतना ही अंतर है। अंतर लिपि में है। तो हमारी लिपि नागरी लिपि अधिक व्याकरण सम्मत हैं। विज्ञान के साथ है और विदेशी नहीं है। आपकी उसी ब्राह्मी के क्रम से आई है। वास्तव में हमने लिपि को लेकर के उलझन फिर उत्पन्न कर दी है। देहात में जाकर देखिए तो जो हिन्दू बोलता है, वही भाषा मुस्लिम बोलता है। अब उन्होंने कहा कि नहीं दो भाषाएं हैं। अब इसी को लेकर लड़ाई है। वास्तव में अगर युद्ध ही चलेगा, रात-दिन विवाद चलेगा, विद्रोह चलेगा तो यह देश गूंगा रहेगा और आप जानते हैं न जो गूंगे हैं, वे बहरे भी होते हैं। न वह सुनेगा, न वह बोलेगा। तो जो सुनेगा, बोलेगा नहीं तो आपका इतने बड़े देश का क्या होगा। इसको कौन बांधेगा, कैसे बांधेगा। तो आज जब आप सब इकट्ठे हुए हैं, देख के मन बड़ा प्रसन्न हो जाता है। लेकिन जब शक्ति उसकी देखते हैं, तो लगता है कि अब क्या होगा। यह तो आज सब जगह से बादल घिरा और चला गया बरस के।

तो वास्तव में आपको एक व्रत लेना ही होगा कि हमको अपने राष्ट्र को वाणी देना है, यानी अपने को ही देना है। कोई विचार कोई जनतंत्र बिना भाषा के नहीं आता। तो मुझे जब बहुत आपने अभिनंदन, वंदन दिया तो मैंने कहा कि भई देवता को आपने बाहर कर दिया है और पुजारी को आप अभिनंदन दे रहे हैं। तो हम जो हिन्दी के नाम से बैठे हैं, अगर हिन्दी को लाते नहीं हैं और हिन्दी ऐसे ही रखते हैं, तो हिन्दी के नाम से एक एकत्र होकर क्या करेंगे और जो विदेश के बंधु आए हैं, वे बेचारे मन ही मन क्या सोचेंगे।

हम अक्सर ऐसी बात करते हैं, राष्ट्रसंघ की बात करते हैं उधर की बातें करते हैं। बिना अंतर्राष्ट्रीय हुए हम जी नहीं सकते और राष्ट्रीय होने की हमें चिंता नहीं है। तो यह तो ऐसे ही हुआ कि पेड़ को आप काट दीजिए और फिर संगमरमर के चबूतरे पर रोप दीजिए। अंतर्राष्ट्रीय वही हो सकती है जिसकी राष्ट्र में जड़ें हों। जिसकी राष्ट्र में जड़ ही नहीं है, वह क्या अंतर्राष्ट्रीय होगा।

आप ही सोचिए कि आप तो राष्ट्रसंघ में उधार लेकर अंग्रेजी में बोलेंगे। आप कहेंगे राष्ट्रसंघ में कि भारत की भाषा अंग्रेजी है। बताइए लोग नहीं हतोत्साहित होंगे? कहते होंगे इतना विशाल देश और इतना हिन्दी का सौहार्द्र और इसके पास बोलने के लिए कुछ है ही नहीं। यह समुद्र पार से उधार लाकर बोलता है। अब तो ऐसी अच्छी अंग्रेजी नहीं जानता। बल्कि गलत-सलत बोलता है। तो मैं कहती हूं यही हीनता की भावना है। इसको दूर करना चाहिए। पहले इसको आप कर सकते हैं।

जिस दिन आप संकल्प करेंगे, उसी दिन कर देंगे। आपमें असीम शक्ति है। लेकिन आपके पास कोई स्वप्न न हो, कोई आदर्श न हो, आपके पास राष्ट्र की चेतना न हो, तो राष्ट्र कैसे बनेगा। कुछ नहीं बनेगा। बाहर के लोग आ जाते हैं, और आ करके बड़े उदास हो जाते हैं। स्नेह के मारे आ जाते हैं, हमारे सौहार्द्र के नाते आ जाते हैं और आके यहां बड़े उदास हो जाते हैं। जब मुझे बोलते हैं, तो यहीं बातें कहते हैं कि हम क्या करें। हमसे तो कोई हिन्दी में बोलता ही नहीं। जहां बात करते हैं, वहां अंग्रेजी ही आ जाती है। हम लोग आज तक अपनी उस हीनता की भावना को नहीं भूले हैं। इतने साल हो गए हैं, अभी हमारी हीनता नहीं गई और जब तक नहीं जाती तब तक राष्ट्र अपने वर्चस्व को नहीं पाता। अस्मिता को नहीं पाता।

विश्व में उसकी वाणी को कैसे कौन सुनेगा, जब उसके पास कोई भाषा नहीं है। यह कहना कि जब इसमें विज्ञान लिखा जाएगा, जब इसमें ज्ञान लिखा जाएगा, तब वह हो जाएगा। आप देखिए तो क्या इसमें लिखा गया है। किसी ने देखा है, कोई पढ़ता है, हिन्दी की पुस्तक। कभी नहीं पढ़ता। आप देखिए जरा, तो आप जब जानते ही नहीं हैं, तो वही मेरी बात आ जाती है कि गाड़ी के पीछे आप घोड़े को बांध दीजिए। गाड़ी चलेगी? कभी चलेगी नहीं। मैं यही कहती हूं कि यह समय का संकेत है। अधिक बात करना भी कठिन है। आप इतने थक गए हैं, मैं स्वयं भी थक गई हूं। लेकिन आपसे कहती हूं कि एक व्रत आपको लेना है। संकल्प आपको लेना है। मंदिर की मूर्ति अगर खंडित हो जाती है तो उसे हम फेंक देते हैं, पूजा नहीं करते। परन्तु हम अपने टूट संकल्पों को लेकर पूजा कर रहे हें। हमें दूसरा संकल्प लेना चाहिए और सोचना चाहिए कि अगर हमारे राष्ट्र को वाणी नहीं मिलती हैं, तो हमारा वर्चस्व नहीं है, हमारी अस्मिता नहीं है। फिर हमारा ज्ञान-विज्ञान के लेखन में भी मन नहीं लगेगा। हम लोग आए हैं, विश्वविद्यालयों से पढ़कर लेकिन अगर हम अंग्रेजी में कविता करते तो? वास्तव में वाणी मनुष्य का परिचय है। वाणी राष्ट्र का परिचय है। उसमें उसका व्यक्तित्व है। आप अपने व्यक्तित्व को खंडित मत कीजिए। आपके संकल्प ऐसे हों, आपके स्वप्न ऐसे हों, आपके आदर्श ऐसे हों कि आप राष्ट्र को जोड़ सकें। देखिए, सूर्य के ताप से धरती में बड़ी दरारें पड़ जाती हैं, लेकिन एक बादल जब बरस जाता है तो सब दरारें मिट जाती हैं। ऐसा ही हमारा स्नेह हों, हमारा सौहार्द्र हो, हमारी ऐसी ही बंधुता हो कि हम सब लोगों को मिला सकें और अन्य देशों में भी हमारी बात सुनी जा सके। अब आपको मैं अधिक थकाऊंगी नहीं। आपसे केवल इतना कहती हूं कि यह विदा की बेला है। परन्तु इसको मत मानिए। स्नेह में कोई विदा होती है? लेकिन हमारा सौहार्द्र, हमारा स्नेह, आप ले जाएंगे। हम एक-दूसरे के निकट रहेंगे। मैं समझती हूं अगर आप निश्चय करें तो एक साल में हमको वाणी मिल जाएगी। अगर हम कुछ भी नहीं करेंगे तो हमें अनंत काल तक वह नहीं मिलेगी। इन शब्दों के साथ मैं आपको अपना प्रणाम देती हूं। धन्यवाद।

(तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन के समापन समारोह में महादेवीजी मुख्य अतिथि थीं)।

 

विनोबाजी का दार्शनिक संदेश (१९७५)

‘विश्व-हिंदी’ के साथ-साथ ‘विश्व-नागरी’ भी चले

विश्व बहुत नजदीक आ गया है। छोटा हो गया है। संस्कृत में हमेशा हम कहते हैं- वसुधैव कुटुम्बकम्। मैंने यह कई दफे समझाया है कि ‘कुटुम्ब’ और ‘कुटुम्बकम्’ में अंतर है। ‘कुटुम्बकम्’ यानी छोटा सा कुटुम्ब। पूरे सौर-मंडल में वसुधा का एक छोटा सा कुटुम्ब है। सृष्टि में कई लाख ग्रह हैं। परमात्मा की सृष्टि अनंत है। उनमें एक पृथ्वी है। इसलिए वह हमारा छोटा सा कुटुम्ब है। हम तो विश्व व्यापक हैं। हमारा कुटुम्ब दूर तक फैला है। चंद्र, मंगल, सब हमारे कुटुम्ब में आते हैं। पृथ्वी हमारा छोटा सा कुटुम्ब है- इतनी व्यापक दृष्टि हमारे पूर्वजों की थी। वेद में शब्द आया है- ‘विश्वमानुष’ अर्थात् ‘मैं विश्व मानव हूं।’ आज के इस विज्ञान (साइंस) के जमाने में सारे विश्व को एक छोटा सा कुटुम्ब मानकर चलना पड़ेगा। इसलिए ‘बाबा’ एक ओर ग्रामदान बोलता है और दूसरी ओर ‘जय जगत्’। ‘जय भारत’ और ‘जय हिन्द’ अब पुराने पड़ गए हैं। विज्ञान के कारण अब सारे विश्व को एक होना पड़ेगा। संपूर्ण विश्व के साथ संबंध रखना पड़ेगा।

विज्ञान और आत्मज्ञान का संबंध घनिष्ठ होना चाहिए। जैसे मोटर में दो यंत्र होते हैं- एक गति बढ़ाने या कम करने वाला और दूसरा दिशा दिखानेवाला, मोटर के लिए दोनों की आवश्यकता है। तो हमारे लिए गति देने वाला यंत्र है- विज्ञान, और दिशा दिखाने वाला है- आत्मज्ञान- अध्यात्म (spirituality)। आने वाले युग में दो शक्तियां काम करेंगी। इनमें मैंने एक शक्ति और जोड़ दी है। बाबा का श्लोक है-

वेदान्तो विज्ञानः विश्वासश्चेति शक्तयः तिस्त्रः यासां स्थैर्ये शांति समृद्धि भविष्यति जगति।

विश्वास तीसरी शक्ति है। विश्वास की शक्ति अहिंसा जैसी है। जो हिंसा करेगा उसे हम अहिंसा से जीतेंगे। उसी प्रकार अविश्वास को विश्वास से जीतना है। सामने वाला हम पर जितना अविश्वास करेगा, हम उस पर उतना अधिक विश्वास करेंगे। वह हमें कत्ल करने को तैयार हो जाए, तो उससे कहना चाहिए- मैं तुम्हारी गोद में सो जाऊंगा, ताकि तुम्हें कत्ल करने के लिए दूर न जाना पड़े। मैं मर जाऊंगा तो भी मैं अपना विश्वास नहीं छोड़ूंगा। तात्पर्य यह है कि तीनों शक्तियों का विकास होगा, तब दुनिया में शांति होगी- एकता होगी।

हिंदी विश्व हिंदी सम्मेलन हो रहा है- यह बड़ी प्रसन्नता की बात है। यू.एन.ओ (UNO) में स्पेनिश को स्थान है, अगर स्पेनिश बोलने वाले १५- १६ करोड़ ही हैं। हिन्दी का यू.एन.ओ में स्थान नहीं है, यद्यपि उसके बोलनेवालों की संख्या लगभग २६ करोड़ है। (इसका कारण यह है कि बिहारवालों ने अपनी भाषा सेंसस में मैथिली, भोजपुरी लिखी है। राजस्थानवालों ने अपनी भाषा राजस्थानी बनाई है। इन कारणों से हिंदी बोलने वालों की संख्या १५ करोड़ रह गई। अगर हम इन सबकी गिनती करते तो हिन्दी बोलने वालों की संख्या कम से कम २२ करोड़ होती। इसके अलावा उर्दू भी एक प्रकार से हिंदी ही है, जिसे बोलने-वालों की संख्या करीब चार करोड़ है)।

इंग्लिश बोलनेवालों की संख्या ३० करोड़ है। चीनी भाषा ७० करोड़ लोग बोलते हैं- ऐसा यू.एन.ओ में लिखा गया है। सत्तर करोड़ की वह भाषा मानी जाती है। यह उनकी (चीनी बोलनेवालों की) कुशलता है। चीन में कम से कम ३०- ४० भाषाएं हैं। परंतु उन सबकी लिपि चित्रलिपि है। उसके साढ़े तीन-चार हजार चित्र हैं। उन चित्रों के अनुसार वे अपनी-अपनी भाषा पढ़ लेते हैं। कोई भी समझ सकता है कि इतने लंबे-चौड़े प्रदेश में एक भाषा हो ही नहीं सकती। इसका अर्थ यह हुआ कि दुनिया में बोलनेवाले लोगों की संख्या की दृष्टि से नंबर एक हैं- इंग्लिश बोलनेवाले और नंबर दो हैं- हिंदी बोलनेवाले। देवनागरी ‘विश्व-हिंदी’ के साथ-साथ ‘विश्व-नागरी’ भी चले। इस काम में देर करने की आवश्यकता नहीं है। कुछ लोगों का विचार है कि इस दिशा में हमको धीरे-धीरे आगे बढ़ना होगा, जिससे कुछ भय मालूम न हो। मैं ऐसा नहीं मानता। देवनागरी लिपि, हिंदी की ही लिपि न मानी जाए। वह ‘संस्कृत लिपि’ है- ऐसा माना जाए। संस्कृत, मराठी, हिंदी, पालि, मागधी, अर्धमागधी, नेपाली- इन सभी भाषाओं की लिपि देवनागरी है। जब संस्कृत विश्व-भाषा बनने की योग्यता रखती है, तो उसकी लिपि देवनागरी को ‘विश्व-नागरी’ के रूप में फैलाने में किसी बाधा का भय क्यों होना चाहिए? विश्व की तमाम भाषाएं यदि देवनागरी अथवा विश्व-नागरी लिपि में भी लिखी जाने लगें, तो ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का स्वप्न शीघ्र साकार होगा।

संस्कृत भाषा के लगभग ३००० शब्द इंग्लिश में कुछ बदले हुए रूप में विद्यमान हैं। मदर (माता), फादर (पिता), ब्रदर (भ्रातृ), नोज़ (नासा) आदि। नी (जानु)- ‘नी’ में ‘के’ का उच्चारण नहीं होता। वास्तव में वह ‘क्नी’ है। अंग्रेजी के अनेक शब्द धातु संस्कृत से बने हैं।

जापानी भाषा में भी लगभग ३०० – ३५० संस्कृत के शब्द मुझे मिले हैं। अपने कोश में मैंने उन पर चिन्ह लगा दिया है। अन्य कई भाषाओं में भी संस्कृत शब्दों की कमी नहीं है। इसलिए जब हम हिंदी को ‘विश्व हिंदी’ बनाने की कल्पना करते हैं, तब देवनागरी लिपि को भी ‘विश्व नागरी’ बनाने की बात सोचना उचित ही माना जाएगा।

(विनोबाजी ने प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन के लिए यह संदेश भेजा था। वे उस जमाने में भी आज के विज्ञान-निर्मित ‘विश्व ग्राम’ की तर्ज पर सोचा करते थे। ‘विश्व नागरी’ विनोबाजी के विचार भी बहुत महत्वपूर्ण हैं)।